दस साल में कितनी बदली बस्तर की राजनीति?

दस साल में कितनी बदली बस्तर की राजनीति?

बाफना ने जब रेखचंद्र को हराया था, उस वक्त बस्तर की 11 सीटों पर भाजपा विजयी हुई थी
जगदलपुर। वर्ष 2008 में जगदलपुर विधानसभा में भाजपा विधायक संतोष बाफना और कांग्रेसी प्रत्याशी रेखचंद्र जैन के बीच जब मुकाबला हुआ था उस वक्त जगदलपुर विधानसभा में भाजपा प्रत्याशी श्री बाफना के जीतने के साथ ही बस्तर में भाजपा को कुल 12 विधानसभा में 11 सीटों पर विजयी मिली थी, सिर्फ कोंटा विधानसभा में कांग्रेसी प्रत्याशी कवासी लखमा ही चुनाव जीतने में कामयाब हो सके थे, दस साल बाद एक बार फिर जगदलपुर विधानसभा में भाजपा की तरफ से संतोष बाफना व कांग्रेस की तरफ से रेखचंद्र जैन आमने सामने है।

इस दस सालों में बस्तर की राजनीति में कितना बदलाव आया है इसका फैसला 11 दिसंबर को चुनाव परिणाम आने के बाद ही मिलेगा। सवाल यह है कि क्या बस्तर की जनता से वर्ष 2008 में जब यह दोनों प्रत्याशी आमने सामने थे उस वक्त बस्तर की जनता ने एकतरफा वोट देकर भाजपा को एतिहासिक जीत दिलायी थी, क्या इस विधानसभा चुनाव में भी ऐसे ही परिणाम की पुर्नावृति होगी, यह ऐसा सवाल है जो इन दिनों राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। गौरतलब है कि 2003 में हुए विधानसभा चुनाव में बस्तर की जनता से भाजपा को 9 सीटों पर जीताया था, पांच साल बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को दो सीट और बढ़ गयी थी, जब श्री बाफना व रेखचंद्र जैन आपने सामने थे, पिछले विधानसभा चुनाव में बस्तर की जनता ने कांग्रेस को 8 सीटों पर जीताया था, क्या पांच साल बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटों में इजाफा होगा या कमी आयेगी, यह भी ऐसा सवाल है जिसकों लेकर राजनीतिक पंडित अपने अपने हिसाब से आंकलन करने में जुटे हुए है

भाजपा के तीन नेताओं के राजनीतिक कैरियर का फैसला करेगा यह विधानसभा चुनाव

लगातार दो हार के बाद टिकट की दौड़ से हमेशा के लिए हो सकते है बाहर
जगदलपुर। इस विधानसभा चुनाव का परिणाम भाजपा के तीन पूर्व विधायक के राजनीतिक का फैसला लिखने जा रहा है। अगर यह पूर्व तीनों विधायक जीतते है तो निश्चित ही उनके राजनीतिक कैरियर को नई ऊचाईयां मिलेगी, वही हार जाते है तो वह आगामी विधानसभा की टिकट दौड़ से शतप्रतिशत बाहर होने का खतरा भी मंडाराने लगेगा।
भाजपा संगठन ने बस्तर में अपने खोये जनाधार को वापस पाने के लिए पिछले विधानसभा चुनाव में हारे पूर्व विधायक लता उसेण्डी, भीमा मंडावी व सुभाऊ कश्यप पर पुन: दाव खेला है, संगठन का यह दाव जमीनी स्तर पर कितना कामयाब होता है इसका खूलासा तो आने वाले 11 दिसंबर को ही सकेगा लेकिन राजनैतिक जानकार मानते है कि अगर कोंडागांव से लड़ रही लता उसेण्डी, बस्तर से लड़ रहे सुभाऊ कश्यप व दंतेवाड़ा से लड़ रहे भीमा मंडावी में जो भी नेता यह चुनाव हारता है तो निश्चित ही उसके राजनीतिक कैरियर पर भी विराम लग सकता है, क्योकि प्रदेश संगठन ने हार के बाद भी इन तीनों नेताओं को टिकट देने से कार्यकर्ताओं में नाराजगी दिखाई दी थी, लेकिन संगठन किसी तरह से इस नाराजगी को खत्म करने मेंं कामयाब हो गयी, हार के बाद इन नेताओं को पार्टी अगर पुन: तीसरी बार टिकट देगी तो निश्चित ही विरोध के स्वर इस विधानसभा चुनाव के तुलना में और भी तेज होगें, जो भाजपा संगठन कभी नही चाहेगी। छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद बस्तर कभी भाजपा का मजबूत किला हुआ करता था उसमें पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सेंधमारी करके भाजपा को भारी नुक्सान पहुंचाया है। क्या इस चुनाव में भाजपा नेता उस नुक्सान की भरपायी इन हारी हुई सीटों को भाजपा के खाते में डाल कर भरपाई करने के साथ ही अपने राजनीतिक कैरियर को नई उढ़ान देंगे?

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