बाघ मल विवाद

जगदलपुर 24 नवंबर। दक्षिण बस्तर मे ंस्थित इंद्रावती रिर्जव बाघ परियोजना में बाघ के मल को लेकर एक विवाद उत्पन्न हो गया। वन विभाग के आला अधिकारियों ने मल को देखकर यह साबित कर दिया कि इंद्रावती बाघ परियोजना में बाघ अभी शेष बचे हुये हैं, पर ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया। न बाघ,न बाघ का मल।
बस्तर संभाग के बीजापुर जिले में स्थित इंद्रावती बाघ परियोजना जो पूर्णतः अतिसंवेदनषील इलाका है। दो माह पूर्व बाघ परियोजना के अधिकारियों ने बाघ का मल पाये जाने की पुष्टि की थी,और इसके लिए बाघ के मल के नमूने को लेकर देहरादुन लैब भेजा गया था। रिर्पोट के अनुसार नमुने फेल हो गये और मल के शेम्पल से बाघ के होने की पुष्टि नहीं हुई। अब यंहा बाघों की मौजूदगी जानने के लिए दूसरे उपायों पर विचार किया जा रहा है। जबकि बाघों की मौजूदगी जानने का सबसे आधुनिक तरिका कैमरे हैं, पर इस बाघ परियोजना में नक्सली खौफ के चलते कैमरे भी नहीं लगवा पा रहें हैं।
टाइगर रिर्जव के वन संरक्षक डा डी.पी. मनारे ने बताया कि बाघों की गीनती प्र्िरकया लम्बी होती है। स्थानीय स्तर के अलावा राष्टीय स्तर से भी गणना की जाती है। उन्होने बताया कि बाघ परियोजना में बाघों की तस्वीर लेने के लिए इन घने जंगलों में कैमरे लगाने की तैयारी की गयी। लेकिन नक्सली प्रभावित इलाका होने की वजह से विभागीय कर्मचारी जंगल के अंदर जाकर कैमरे लगाने का काम नहीं कर रहें हैं। पूर्व में 12 कैमरे लगाये गये थे। जो आधे से अधीक टूट चुके हैं। इन इलाकों में दस हजार कैमरे लगाने की योजना थी , पर वनकर्मचारियों के साथ – साथ ग्रामीण भी इस काम से इंकार कर रहें हैं। उन्होने बताया कि 2014 में इंद्रावती टाईगर रिर्जव क्षेत्र में हुई गणना के अनुसार बारह बाघ मिले थे। मौजूदा स्थिति में कितने बाघ हैं इसकी अधिकारीक जानकारी नहीं है।
इधर बस्तर प्रकृति बचाओ के संस्थापक एंव वन्य प्राणी के सदस्य शरद वर्मा ने कहा कि प्रांरभ से ही बाघ परियोजना में बाघों की गिनती को लेकर हमेषा विवाद रहा है। करोड़ो रूपए खर्च करने के बाद इस इलाके में न कर्मचारियों ने और ना ही ग्रामीणों ने पिछले कई सालो ंसे बाघ को देखा ही नहीं है। उन्होने आरोप लगाया है कि इन्हैं बाघों के मल की पहचान भी नहीं है। पिछले एक दषक से अधिक समय तक इस इलाके में बाघ दिखायी नहीं दिया, और इसका कारण जानने के लिए विभाग ने कोई ठोेस कदम नहीं उठाया।
श्री वर्मा ने आगे कहा कि बाघ को बचाने के लिए स्थानीय स्तर से ग्रामीणों के सहयोग से जुटना होगा, और वास्तविक स्थिती का पता लगना होगा।
बाघ परियोजना के एक कर्मचारी ने बताया कि पिछले तेवीस साल से इस बीहड़ इलाके में तैनात हूं। पर मैंने आज तक एक भी बाघ नहीं देखा। करीम

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